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रूढ़िवादी सामाजिक कलंक

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 #रूढ़िवादी...


हरेक रोज सुबह से लेकर शाम तक और शाम से सुबह तक 

एक आवाज़ थी जिसने शाम मेरा पूरा ध्यान खींच रखा था उसकी तरफ,एक तरह से जो चुभ सी गई और मैं कुछ नहीं कर पाया लिखने के सिवा...

बस वही कुछ पंक्तियाँ है.....


क्या वही आवाज़ है यह,जो सदा मुस्कान देती

आज सुबह जाने मुझसे,रूठी रूठी जा रही थी

चेहरे से यूँ लग रहा था,रात भर सोई न होगी

खोई सी जो चल रही थी,टूटी टूटी जा रही थी।


हाँ, वही आवाज़ है यह,जानता हूँ मैं इसे

दूर कुछ घर से खड़ी है,माँ के संग बतिया रही है


"चार महीनों से जो पैर दर्द,उसकी दवा भी ना

रेंगती सी चल रही हूँ,घर को कारज कर रही हूँ

और बच्चों संग,खेती और पशु सम्भालती हूँ

सहने आई हूँ जगत में,सह रही हूँ,रह रही हूँ

कल भी पूरा दिन मजूरी कर बिताया मैंने काकी

शाम को घर आके मैंने अन्न का दाना था खाया

रात को बारह बजे आया भटक कर पति घर में

कुछ कसर बाकी थी,सो भी मार कर उसने चुकाया

मार खा कर ढोल भी बजता,पशु भी चींखते हैं

पर मेरे दुर्भाग्य,मैं तो ऐसा भी कुछ कर न पाई

गोद में बच्ची लिए जो दूध उसको पिलाती थी

सच कहूँ,वह दूध न था,आँसू मेरे पी रही थी..

आई हूँ जब से ब्याह कर,तब से ये ही सुख है मेरे"


"क्या यही संसार है और क्या यही मनुष्यता है?

क्या यही है बेटी बनना,क्या यही है ब्याह रचना?

क्या यही जीवन है मेरा,क्या यहीं पर मौत होगी?"


माँ से कह कर हाल सारा,वह चली फिर अपने घर को,

जहाँ उसके 'देवता' शायद पुनः 'प्रसाद' देंगे.....।


एक स्त्री सब बन सकती है प्रेम में तुम्हारें

वक्त आने पर...

प्रेमिका,

एक अच्छी दोस्त ,

पत्नी,

माँ,

बहन,

बिस्तर पर वेश्या भी...


सारे रिश्ते निभा सकती है..

बस वो विकल्प नहीं बनना चाहती ...कभी.!

और वो पुरुष है उसे हो सकता है प्यार किसी

से भी,उसे पूरा अधिकार है...


किन्तु इस संवाद में उर अब भी मेरा जल रहा है

बहुत पीड़ा हो रही है और फफोले उठ रहे हैं

और मेरे जिन करों को सहानुभूति और प्यार के लिए

 उठनी चाहिए थी,बेबस और लाचार होकर ही सही

 कि इस हाथ ने अब कलम से सन्तुष्टि पाई...।।


#रूढ़िवाद_सामाजिक_कलंक😏  ©जनार्दन✍️



                फोटो साभार इंटरनेट

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